Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 57
छप्पनर्वौ सर्ग समाप्त सत्तावनवाँ सर्ग अज्ञात स्वस्वरूप चैतन्य द्रष्टा होने के कारण जिस दुश्य स्वरूपता को धारण करता है वह चित् ही है उससे अन्य नहीं है, यह वर्णन |
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- Verse 1इस प्रकार सारे जगत् का चित् से अभेद परमार्थरूप से सिद्ध होने पर व्यवहार अवस्था में भी ज…
- Verse 2आत्मरूपी लवण के (नमक के) अन्दर चित् होने के कारण लवणता प्रथितिरूप (प्रसिद्ध) जो वेदन है,…
- Verse 3आत्मारूपी ईख के अन्दर चित् होने से जो स्वतः माधुर्यवेदन है, वह तत् तत् आकारो से अभिव्य…
- Verse 4आत्मरूप पाषाण का चित् होने से जो स्वतः काठिन्य प्रथितिरूप वेदन है वह अहन्ता, त्वन्ता आदि…
- Verse 5आत्मरूप पर्वत का चेतन होने से जो स्वतः गुरुता प्रथितिरूप वेदन है वह अहन्ता, त्वन्ता आदिरू…
- Verse 6आत्मरूपी जल का चित् होने से जो स्वतः द्रवत्व आदि में वर्तन है वह आवर्तं आदि, अहन्ता त्वन…
- Verse 7आत्मरूप वृक्ष चित् होने से जो शाखादिरूप से प्रथितिरूप वेदन है वह अहन्ता, त्वन्ता आदिरूप,…
- Verse 8आत्मरूपी आकाश का चित् होने से जो शून्यता प्रथितिरूप वेदन है वह अहन्ता, त्वन्ता आदिरूप, घ…
- Verse 9आत्मरूपी आकाश काचित् होने से जो मूर्त पदार्थो के अन्दर छिद्रता प्रथितरूप वेदन है वह अहन्…
- Verse 10आत्मरूप दीवार का जो स्वतः निरन्तर निबिडताप्रथितिरूप का अनुभव हे वह अहन्ता आदि भेद से दृश्…
- Verse 11आत्मसत्ता का चित् होने से जो स्वतः एकमात्रसत्ता के रूप से वेदन है वह अहन्तादि, भेदआदि चि…
- Verse 12आत्मप्रकाश का जो स्वतः अवभासन है वही अहन्ता त्वन्ता आदि की और वृत्ति भेद से भिन्न चिदाभास…
- Verse 13आत्मरूपचन्द्रमा के अन्दर जो चिद्रूप चिदमृत है उसके द्वारा स्वप्रकाश रूप से स्वतः आस्वादित…
- Verse 14परमात्मरूपी गुड़ के अन्दर जो चित् स्वादुरूप है उसी का वह अपने में ही अहन्तारूप से स्वतः…
- Verse 15परमात्मारूप मणि का चित् होने के कारण जो अन्दर स्वयं स्फुरण होता है उसीकी चेतनारूप स्वरूप…
- Verse 16मायिक जगदाकार का जो अभाव हैं, वह केवल स्वप्रकाश स्वात्मानुभव स्वरूप ही है, इसका भलीभाँति…
- Verse 17यह आत्मा विकार होने योग्य वस्तु का अभाव होने पर अपने भीतर विभिन्न जीवादि चैतन्य रूप से क…
- Verse 18असत् जगदाकार का अधिष्ठानभूत ही अनन्त आत्मा, जिसका कि स्वरूप परिपूर्ण है, सर्वदा एकरूप हो…
- Verse 19तब “यदात्ममरिचस्य“ इत्यादि कथन का क्या अभिप्राय है ? इस प्रश्न पर उसका अभिप्राय कहते हैं…
- Verse 20न चित्त है, न प्रमाता है ओर न जगदाकार आदि विभ्रम है, पहले वर्षाकाल में बरस चुकने के कारण…
- Verse 21जैसे द्रवस्वभाव होने के कारण जल ही जल में आवर्त आदि भाव को प्राप्त होता है, वैसे ही मायाव…
- Verse 22जैसे जल में द्रवत्व रहता है, जैसे सदा गमन करनेवाले वायु में स्पन्द रहता है, वैसे ही परमार…
- Verse 23यदि जीव का स्वरूप ओर जगत् का स्वरूप दोनों ज्ञप्ति से भिन्न नहीं है, तब ज्ञप्ति के जीव ओर…
- Verse 24इसलिए जीव की ज्यो-ज्यो भ्रान्ति होती जाती है, त्यो त्यों ईश्वर का विवर्त (उपादान की सत्ता…
- Verse 25जब इसने (जीव ने) सत्-शास्त्रों से और सद्-गुरुओं के उपदेशों से यह जान लिया कि इस भोग्य ज…
- Verse 26जीव और इश्वर का भेद करनेवाले अज्ञान के विनष्ट हो जाने पर प्रज्ञ ओर तुरीय का भेद भी निवृत्…
- Verse 27निचोड अर्थ का अनुवादपूर्वक उपसंहार करते हैँ । समस्त जगत् पूर्णस्वप्रकाशस्वरूप, आनन्दैकरस…