Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
ज्ञो ज्ञतायां शिव ज्ञानं जानाति ज्ञानबृंहया ।
ज्ञायतेऽहंतदि ज्ञेन जीवादीत्यभिजीवनैः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि जीव का स्वरूप ओर जगत् का स्वरूप दोनों ज्ञप्ति से भिन्न नहीं है, तब ज्ञप्ति के जीव ओर
इश्वरभाव में परस्पर क्या भेद रहा ? इस प्रश्न पर कहते है ।
ईश्वर अपने शरीर भाव मेँ निरतिशय आनन्दरूप स्वरूपज्ञान को ज्ञान की अभिवृद्धिसे यानी समग्र
आवरण ओर परिच्छिन्नतासे शून्य ज्ञान की अभिवृद्धि से सदासर्वदा ही जानता है और अहंकार एवं
स्थूल-देहस्वरूप जीवभाव में तो चेतनरूप होता हुआ भी जीवन के हेतुभूत प्राण, इन्द्रिय ओर विषयों
के साथ अनेकविध अध्यासो के कारण “मैं जीव आदिस्वरूप वही आत्मा हू" यों जानता है, तात्ततिक
ज्ञान उसे नहीं रहता, यही उनमें भेद है