Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
यथोदेति ययाऽज्ञस्य तृप्तिर्ज्ञानेन यादृशी ।
अनन्ये वान्यता बुद्धा स तथा जृम्भते तया ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए जीव की ज्यो-ज्यो भ्रान्ति होती जाती है, त्यो त्यों ईश्वर का विवर्त (उपादान की सत्ता
सो विषम सत्तावाला परिणाम) होता जाता है । यह कहते हैं।
जिस-जिस कारण ओर कर्मो की वासना से जिस प्रकार के विषय परिज्ञान से अज्ञानी जीवात्मा
को जिस दर्शन, लाभ ओर उपभोग के वैचित्र्य से जिस-जिस तरह के प्रिय, मोद, प्रमोद आदि
विभिन्न विभिन्न प्रकार के उपभोगों का आविर्भाव होता है अथवा वह अनन्य स्वरूप में जेसी
भोक्ता, भोग्य ओर भोग की विचित्रतारूपी अन्यता का अनुभव कर लेता है, उस-उस जीव की काम
आदि की वासना से वह परमेश्वर वैसे-वैसे अपने अंगों को विवर्तित करता है यानी वैचित्र्य धारण
करता है