Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यथा द्रवत्वं पयसि यथा स्पन्दः सदागतौ ।
अहंतादेशकालादि तथा ज्ञे ज्ञप्तिमात्रके ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल
में द्रवत्व रहता है, जैसे सदा गमन करनेवाले वायु में स्पन्द रहता है, वैसे ही परमार्थरूप से केवल
ज्ञप्तिस्वरूपवाले सर्वज्ञ परमात्मा में अहंता, देश काल आदि रहते हैं