Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
स्वतो यदात्मकुड्यस्य नैरन्तर्यं निरन्तरम् ।
तदहंतादिभेदेन चित्ताद्वहिरिव स्थितम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मरूप दीवार का जो स्वतः निरन्तर निबिडताप्रथितिरूप का अनुभव हे
वह अहन्ता आदि भेद से दृश्य होने से चित् से व्यतिरिक्त-सा (भिन्न-सा) बाहर स्थित है