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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

न च किंचन वेत्त्यन्तर्वेद्यस्यासंभवादिह । न चास्वादयति स्वादु स्वाद्यस्यासंभवादयम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

मायिक जगदाकार का जो अभाव हैं, वह केवल स्वप्रकाश स्वात्मानुभव स्वरूप ही है, इसका भलीभाँति परिज्ञान कराने के लिए ही पश्यति” वेत्ति^ ˆआर्वादयति^ आस्वाद्यते“ (देखता है, जानता है, स्वाद लेता है, आस्वादित होता है) इत्यादि कर्मकर्तुभाव से व्यवहार होता है, न कि तथोक्त जगदाकार अनुभव स्वप्रकाश स्वात्मानुभव से भिन्न है, यो उनके भेद का साधन करने के आशय से वैसा व्यवहार होता है, यों कहते हैं । यह आत्मा यहाँ पर परमार्थतः जानने योग्य वस्तु का अभाव होने के कारण जानने योग्यवस्तु का अपने अन्दर न अनुभव करता है और स्वाद लेने योग्य वस्तु का अभाव होने के कारण न तो आस्वाद्य वस्तु का स्वाद लेता है