Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

सर्वं प्रशान्तमजमेकमनादिमध्यमाभास्वरं स्वदनमात्रमचेत्यचिह्नम् । सर्वं प्रशान्तमिति शब्दमयी तु दृष्टिर्बोधार्थमेव हि मुधैव तदोमितीदम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

निचोड अर्थ का अनुवादपूर्वक उपसंहार करते हैँ । समस्त जगत्‌ पूर्णस्वप्रकाशस्वरूप, आनन्दैकरस, विषय एवं अपने भेदक धर्मो से शून्य, एक, आदि-मध्य से शून्य, प्रशान्त ब्रह्मस्वरूप ही हे । ऐसी स्थिति में “सर्व प्रशान्तम्‌ (सब प्रशान्त ब्रह्मरूप है) इत्यादि तात्कालिक शब्दमयी दुष्टिपदों से बोधित होनेवाले अर्थो के अभेदसंसर्ग का उल्लेख करनेवाली आहार्य (बनावटी) भेददृष्टि साक्षात्‌ प्रयोजन न होने के कारण मिथ्या ही है, क्योकि विरोधका भान होने पर भागत्याग-लक्षणा का आश्रय ले कर लक्ष्यार्थं अखण्ड का बोध कराना ही उसका प्रयोजन हे । उक्त वाक्य से बोध्य अखण्डरूप अर्थ तो ॐकार से लक्षित जो विशुद्ध चैतन्य है, वहीं हे, अतएव यह सब ॐकार स्वरूप हे, यही कहना चाहिए । ॐकार से विशुद्ध चैतन्य यों लक्षित होता है - ॐकार, जगत्‌ ओर ब्रह्म का एकीकरण कर तदनन्तर विराट्‌, हिरण्यगर्भ, अव्याकृत ओर तुरीयस्वरूप अकार, उकार, मकार ओर अर्धमात्रा यों ॐकार के चार तरह पादों का विभाग कर पूर्व पूर्व पादो का उत्तरोत्तर पादो मे उपसंहार कर लेने के अनन्तर चतुर्थ आधी मात्रा से असंसृष्ट अद्रय पूणानन्दएकरस नित्य- अपरोक्ष प्रत्यक्‌-चिन्मात्रस्वरूप ब्रह्म बोधित होता हे