Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 42
इकतालीसर्वौँ सर्ग समाप्त बयालीसवाँ सर्ग भगवान् विष्णु का पुनः क्षीरसागर में गमन, आख्यान का उत्तम फल और समाधि से जीवन्मुक्तो के व्युत्थान में हेतु का वर्णन ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, ऐसा कह कर सुर, नर ओर किन्नरों के सहित भगवान् प…
- Verses 2–3प्रह्लाद आदि द्वारा पीछे से छोडी गई पुष्पांजलियों की राशि से, जो पक्षिराज गरुड के पीछे के…
- Verse 4इस प्रकार शेषनाग के शरीररूपी आसन पर भगवान् विष्णु, स्वर्ग में देवताओं के साथ इन्द्र और प…
- Verse 5हे श्रीरामचन्द्रजी, यह अवशेष पापों को दूर करनेवाली प्रह्लाद की ज्ञानप्राप्ति मैंने आपसे क…
- Verse 6उसको जो मनुष्य , चाहे वे बड़े पातकी ही क्यों न हों, संसार में बुद्धि पूर्वक विचार करेंगे…
- Verse 7सामान्य विचार से भी जब पाप का नाश हो जाता है तब वेदान्त वाक्यों के विचार से कौन परम पद को…
- Verse 8अज्ञान पाप कहलाता है, वह विचार से नष्ट होता है, इसलिए पाप की जड़ उखाड़ फेंकनेवाले विचार क…
- Verse 9प्रह्लाद की इस सिद्धि का विचारकर रहे लोगों के सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है, इसमें को…
- Verse 10विदेह मुक्त के साथ समाधि मुक्त के विश्रान्ति सुख की समता होने पर फिर उसके व्युत्थान में ह…
- Verse 11प्रारब्ध शेष से उद्बोधित शुद्धवासना सहित भगवद् इच्छा ही समाधिमुक्त के प्रबोध में हेतु है…
- Verse 12जिस अनासक्त मतिवाले पुरुष का इष्ट ओर अनिष्ट कर्मो के त्याग और ग्रहण में राग नहीं है, उसकी…
- Verses 13–15हे श्रीरामचन्द्रजी, वही देह धारण में हेतुभूत प्रारब्ध शेष का भोग द्वारा क्षय होने पर पुनर…
- Verse 16हे रघुवर, देह धारण हेतु प्रारब्ध के शेष रहने पर हजारों वर्षो के बाद भी हृदयमें स्थित उसी…
- Verse 17हे महाबाहो, प्रह्लाद हृदय में स्थित अपनी शुद्धसत्त्वमयी वासना से, जो शंख ध्वनि से उद्बुद्…
- Verse 18यदि किसी को शंका हो कि श्रोत्रेन्द्रिय के विलीन होने पर शंख ध्वनि का भी ग्रहण नहीं हो सकत…
- Verse 19भगवान् वासुदेव ने जब प्रह्लाद प्रबोध को प्राप्त हो, ऐसा विचार किया तभी पलक भर में ऐसा हो…
- Verse 20उन्होंने काम, कर्म आदि निमित्तों से अपने में ही जगत् की सृष्टि के लिए वासुदेवमयरूप से शर…
- Verses 21–22इसीलिए उनके शरीर का दर्शन होने पर आत्मदर्शन होता है और आत्मदर्शन होने पर उनका दर्शन सुलभ…
- Verse 23हे श्रीरामचन्द्रजी, इस सृष्टि का अवलम्बन करके आप शीघ्र आत्मदर्शन के लिए प्रयत्न करें। विच…
- Verse 24यह अत्यन्त दैदीप्यमान माया विष्णुरूप आत्मा के प्रसाद से धीर पुरुषों को ऐसे ही पीड़ित नहीं…
- Verse 25जैसे अग्नि की ज्वाला वायु के कारण ही निबिड़ता को प्राप्त होती है और अन्त में क्षीणता को प…