Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 42, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 42, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
आत्मेच्छयैव घनतां समुपागतान्तरात्मेच्छयैव तनुतामुपयाति काले ।
संसारजालरचनेयमनन्तमायाज्वालेह वातवलयादिव पावकस्य ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अग्नि की ज्वाला वायु के कारण ही निबिड़ता को प्राप्त होती है और अन्त में क्षीणता को प्राप्त हो
जाती है वैसे ही संसार जाल रचनारूप यह विष्णुमाया आत्मा की इच्छा से ही देहादिरूप निबिड़ अनर्थता
को प्राप्त हुई है। निश्चय भक्ति, ध्यान आदि से आराधित आत्मा की इच्छा से ही विवेक , विचार आदि
के जन्म के समय क्षीणता को प्राप्त हो जाती है, अतएव ईश्वरप्रसाद से उत्पन्न विचार आदि से ही
अवश्य ज्ञान लाभ होता हे, यही इस उपाख्यान का तात्पर्य हे