Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 42, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 42, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा पुण्डरीकाक्षः सनरामरकिन्नरः । द्वितीय इव संसारश्चचालासुरमन्दिरात् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, ऐसा कह कर सुर, नर ओर किन्नरों के सहित भगवान्‌ पुण्डरीकाक्ष, जो सुर, नर और किन्नरों से युक्त होने के कारण ही दूसरे संसार के समान विस्तृत थे, असुरगृह से चले

सर्ग सन्दर्भ

इकतालीसर्वौँ सर्ग समाप्त बयालीसवाँ सर्ग भगवान्‌ विष्णु का पुनः क्षीरसागर में गमन, आख्यान का उत्तम फल और समाधि से जीवन्मुक्तो के व्युत्थान में हेतु का वर्णन ।