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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 40

उनतालीसवाँ सर्ग समाप्त चालीसवाँ सर्ग सदेह होता हुआ भी विदेह और कर्मपरायण होता हुआ भी कुटस्थ ज्ञानी जिस क्रम से व्यवहार करे, उस क्रम का प्रतिपादन ।

24 verse-groups

  1. Verse 1यद्यपि प्रह्माद जीवन्मुक्त था तथापि उसके लिए केवलसंनिधि से राज्यपालन के निर्वाह के उपाय क…
  2. Verse 2हे महामते, इन दोनों (स्थिरता और प्राणोत्क्रमण) पक्षों से तुम मुक्त हो, अतएव यहाँ तुम्हारा…
  3. Verse 3नहीं होता, ऐसा क्यो कहा 2 यदि प्रह्लाद की ओर से यह प्रश्न हो, तो उस पर कहते हैं। हे शत्रु…
  4. Verse 4जैसे आकाश में स्थित भी वायु संगरहित (संबन्ध शून्य) होने के कारण आकाश शून्य होता है ऐसे ही…
  5. Verse 5मेरी देह में स्थिति कैसे ज्ञात होती है ? इस पर कहते है । हे सुव्रत, देह में शीत, उष्ण आदि…
  6. Verse 6यदि प्रह्लाद पूछे कि मेरी अदेहता कैसे ? तो इस पर कहते हैं। तुम्हे तत्त्वज्ञान हो चुका हे,…
  7. Verse 7यदि अज्ञानी भी देह में रह कर देही है, तो स्पर्श के संवेदन से देह में स्थित मैं देही क्यो…
  8. Verse 8यदि कोई कहे कि जिसकी वृद्धि से अपने हर्ष की वृद्धि हो और जिसके विनाश निमित्त के दर्शन से…
  9. Verse 9पर्वतो के ढहने पर भी, प्रलयाग्नियों के धधकने पर भी ओर उत्पातवायुओं के बहने पर भी तत्त्वज्…
  10. Verse 10सब भूत चाहे रहे चाहे सब कुछ चला जाय अथवा सबका नाश हो जाय या सब वृद्धि को प्राप्त हों, किन…
  11. Verse 11इस देह के विनष्ट होने पर परमात्मा का विनाश नहीं होता है, इसके बढ़ने पर परमात्मा नहीं बढता…
  12. Verse 12देह के सम्बन्धी में "अहं" इस प्रकार तादात्म्याध्यासरूप देही हूँ तद्धर्मसंसगध्यासरूप चित्त…
  13. Verse 13हे तात, इस कार्य को करके मैं इस कार्य को करता हूँ, इसका त्यागकर के इसका त्याग करता हूँ, त…
  14. Verse 14ज्ञानी पुरुष इस संसार में सब कुछ करते हुए भी कुछ भी नहीं करते हैं । कर्म के कभी-भी न करने…
  15. Verse 15जब वे कर्ता नहीं हे तब अभोक्तृत्व सहज ही उनमें प्राप्त हो गया । भला बतलाइये तो सही, धान आ…
  16. Verse 16कर्तृत्व ओर भोक्तृत्व के शान्त होने पर एकमात्र निर्विक्षेपता ही अवशिष्ट रहती है । कर्तृत्…
  17. Verse 17ज्ञानवान्‌, चैतन्यस्वरूप परमात्मस्वरूप के आविर्भाव से सब कुछ का तिरस्कार करके स्थित हुए श…
  18. Verse 18ग्राह्य, ग्राहक और तत्संबन्धरूप अज्ञानावस्था में यथार्थरूप से प्रतीत क्रिया ओर कारक के सं…
  19. Verse 19एेहिक ओर पारलौकिक इष्ट ओर अनिष्टो के साधनों के त्याग ओर उपादान के निमित्त ग्राह्मग्राहक स…
  20. Verse 20इस प्रकार से स्थित हुए जीवन्मुक्त लोगों को भी जब तक प्रारब्ध का क्षय नहीं होता तब तक व्यव…
  21. Verse 21परब्रह्म के ज्ञान से वासनारहित हुए तुम इस जगत्‌ में आत्मनिष्ठ बुद्धि से अर्धसुषुप्त के सम…
  22. Verse 22जिनका चित्त स्वात्मा में ही संलग्न है ऐसे ज्ञानी पुरुष, रमणीय अनात्म पदार्थो में सुख का अ…
  23. Verses 23–24यदि कोई कहे कि ज्ञानियों को जब सुख और दु:ख हैं ही नहीं तव वे सुख की प्राप्ति ओर दुःख के प…
  24. Verse 25हे महात्मन्‌, भीतर भगवान विष्णु की पदवी को प्राप्त हुए तुम ब्रह्मा के एक दिन तक इस पाताल…