Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 40, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 40, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
समुदेतु वसन्तो वा वातु वा प्रलयानिलः ।
भावाभावविहीनस्य किमभ्यागतमात्मनः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि जिसकी वृद्धि से अपने हर्ष की वृद्धि हो और जिसके विनाश निमित्त के दर्शन से
विषाद हो वह देह है और उससे अन्य अदेह है इस प्रकार का भेद क्यो न होगा ? तो इस पर ऐसा नहीं
कह सकते, क्योकि तत्त्वज्ञानी के हर्ष और विषाद के हेतु का कही संभव नहीं है, ऐसा कहते हैं।
चाहे वसन्त ऋतु का उदय (आगमन) हो चाहे प्रलयकाल की घनघोर आँधी बहे तथापि अप्रिय
ओर प्रिय से शून्य आत्मा का क्या आया