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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 40, Verses 23–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 40, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 23, 24

संस्कृत श्लोक

नित्यप्रबुद्धा गृह्णन्ति कार्याणीमान्यसङ्गिनः । मुकुरा इव बिम्बानि यथाप्राप्तान्यवाञ्छया ॥ २३ ॥ जाग्रति स्वात्मनि स्वस्थाः सुप्ताः संसारसंस्थितौ । बालवत्प्रविवेपन्ते सुषुप्तसदृशाशयाः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि ज्ञानियों को जब सुख और दु:ख हैं ही नहीं तव वे सुख की प्राप्ति ओर दुःख के परिहार के लिए कर्म क्यो करते है ? तो इस पर कहते हैं। नित्यप्रबुद्ध असंग पुरुष, यथाप्राप्त इन कार्यो को जैसे दर्पण बिम्बों को ग्रहण करते है वैसे ही अनास्था से ग्रहण करते हैं । संसार स्थिति में सोये हुए आत्मनिष्ठ पुरुष स्वात्मा में ही जागरूक रहते हैं । सुषुप्त के सदुश आशयवाले वे बालकों की नाई व्यवहार करते हैं