Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 49
अड़तालीसवाँ सर्ग समाप्त उनचासवाँ सर्ग शाखा, पल्लव, पुष्प, फल और पक्षियों से मनोहर कदम्ब वृक्ष का उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों से वर्णन ।
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- Verses 1–3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर उसने वन के मध्य में स्थित कदम्ब वृक्ष क…
- Verse 4गुड्डच्छ लताओं की दन्त पंक्ति के समान स्थित स्वच्छ मंजरी के पुंज से केसर युक्त हुए, ओस के…
- Verses 5–7लताओं की अत्यन्त शोभा से उल्लसित हो रहे फूलों के केसर मेँ स्थित परागों से उसने मण्डलाकार…
- Verse 8प्रत्येक स्कन्ध प्रदेश में खोखलों मे रहनेवाले, भीतर स्थित आधे शरीर से खोखले मेँ निमग्न ओर…
- Verse 9कपिंजल नामक पक्षियों के जोर के चह-चहानेसे, कोकिलो के मधुर गुंजन से और चकोरों की दीर्घ ध्व…
- Verse 10अपने घोंसले में क्रीडा कर रहे कलहंसों के समूहों से वह ऐसे व्याप्त था जैसे स्वर्गरूप कोटर…
- Verse 11जैसे पल्लव के समान चंचल सुन्दर हाथवाली ओर भवर के समान नेत्रवाली अप्सराओं से स्वर्ग चारों…
- Verse 12इन्द्रधनुष की सुन्दरतावाले कुमुद, नीलकमल, रक्तकमल आदि के तुल्य भाँति-भाँति के फूलों के पर…
- Verse 13वह हजारों भुजाओंरूपी शाखाओं से युक्त था ओर उसने आकाश ओर पृथिवी के मध्यभाग को भर दिया था,…
- Verse 14उसके तलप्रदेश मेँ गजराज बैठे रहते थे, आकाश में वह तारागणों से युक्त था तथा मध्यप्रदेश में…
- Verse 15कदम्बवृक्ष अपने द्वारा रचे गये सब प्राणियों, पर्वतो ओर वनों से शोभित हो रहे ब्रह्माजी के…
- Verse 16पल्लवो में फूलों के परागों से आच्छादित कलियों के समूहों को धारण कर रहा वह सूर्य की किरणों…
- Verse 17चंचल पक्षियों से पूर्ण हजारों घोंसलों से व्याप्त स्कन्धो से परिवेष्टित वह लोगों से भरे हु…
- Verses 18–20वह सब वनदेवियों के उत्तम अन्तःपुर के सदुश्य था, मंजरियाँ ही उसमें पताका थी, लताओं के मण्ड…
- Verse 21गुन- गुना रहे भँवररूपी तरंगसमूहों से युक्त गिर रहीं पुष्पों की केसर राशियों से वह ऐसे विर…
- Verse 22मन्द-मन्द वायु से विलसित होनेवाले घूम रहे पत्र-पुष्पों के समूहों से, जो कि दिन-प्रतिदिन ब…
- Verse 23वनगज के गण्डस्थल से धिसे हुए अतएव अत्यन्त उन्नत ऊपर को जानू किये हुए पुरुष की जानू के समा…
- Verse 24जैसे पार्षदों के समूह से भगवान विष्णु आवृत रहते हैं वैसे ही विचित्र रंग बिरंग के पंखवाले,…
- Verse 25चंचल फूलों के गुच्छरूपी अंगुलियों से वह वन वायु से नाच रही लताओं को नृत्यक्रिया का मानों…
- Verse 26मूल, कोटर, कन्धा, शाखा, पत्र, पुष्प आदि प्रदेशों मेँ से मेरा कोई एक ही प्रदेश आश्रयप्रार्…
- Verse 27लतारूपी कान्ताओं का एकमात्र प्रिय होने के कारण श्रृंगार-रस से परिपूर्णं वह मत्त भँवर के श…
- Verse 28आकाश में चलनेवाले सिद्धो का वह आदरपूर्वक पुष्पवृष्टि कर कोयल ओर भ्रमरो की ध्वनियों से मान…
- Verse 29समीप में स्थित वट, गूलर, पाकड, आम ओर पलाश नामक पाँच पवित्र वृक्षों के या उत्तर प्रदेश में…
- Verse 30ऊपर उडनेवाले पक्षियों के स्ुण्डों से मानों पारिजात को जीतने के लिए खूब ऊँची गर्दन करके आक…
- Verse 31मध्यभाग में चमक रहे, भँवरों से युक्त, बड़ी-बड़ी निबिड पंक्तिवाले पुष्प गुच्छों से, जिनकी…
- Verse 32कहीं पर फूलों के गुच्छेरूप फणों में स्थित निर्मल मणियों से आवृत वह आकाश को देखने की इच्छा…
- Verse 33पुष्पराग से उसका सारा आकार धूसरित था, अतएव वह धूलि धूसरित द्वितीय शंकर-सा था। भगवान शंकर…
- Verse 34उस कदम्बवृक्ष को, जो घन पत्तों के समूहों में खिली हुई कलियाँवाले, पुष्पलताओं के नूतन मण्ड…