Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 49, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 49, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
लताकान्तैककान्तत्वाच्छृङ्गाररसनिर्भरम् ।
काकल्येव प्रगायन्तं मत्तालिनिजनिःस्वनैः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
लतारूपी कान्ताओं का एकमात्र प्रिय होने के कारण श्रृंगार-रस से परिपूर्णं वह मत्त भँवर के शब्दरूपी
अव्यक्त अपने मधुर शब्दों से मानों गा रहा था