Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 49, Verses 18–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 49, verses 18–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 18-20
संस्कृत श्लोक
मञ्जरीसुपताकाढ्यं लतामण्डलमण्डितम् ।
पुष्पमङ्कोलधवलं पुष्पप्रकरपूरितम् ॥ १८ ॥
कूजच्चकोरभ्रमरशुककोकिलसारिकम् ।
घनस्तबकसंछन्नकुहरोग्रगवाक्षकम् ॥ १९ ॥
संचरत्पक्षिबहुलं जनमन्थरकोटरम् ।
सर्वासां वनदेवीनामन्तःपुरमिवोत्तमम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
वह सब वनदेवियों
के उत्तम अन्तःपुर के सदुश्य था, मंजरियाँ ही उसमें पताका थी, लताओं के मण्डपं से वह अलंकृत
था एवं वह फूलरूपी मंकोल से (वूर्ण-विशेष से) सफेद, फूलों के समूहों से भरा हुआ, शब्द कर रहे
चकोर, भवर, शुक, कोयल, मैना से युक्त, इधर-उधर उड रहे पक्षियों से सुशोभित तथा छाया के
सेवन करनेवाले मनुष्यों से सेवित (अन्तःपुर के पक्ष मेँ परिचारक जनों से पूर्ण) था