Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 3
दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्म जगत की विवर्तरूपता का स्थापन करके बोधदृष्टि से उसके बाध का प्रदर्शन तथा अज्ञ पुरुष की दृष्टि में जगत की अनन्तता का वर्णन ।
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- Verse 1यद्यपि बाह्य घट आदि पदार्थो की उत्पत्ति में उत्पक्तिकर्ता से अतिरिक्त सहकारी कारणो की अपे…
- Verse 2आप कहते हैं) यह जगत स्मृतिरूप ही है, पहले-पहल सर्वप्रथम प्रजापति स्मरणरूप से ही उत्पन्न ह…
- Verse 3इस कारण उसका संकल्पभूत यह जगत स्मृतिरूप ही है, प्रजापति का प्राथमिक संकल्प का नगर ही इस ज…
- Verse 4अस्तु, मन से अतिरिक्त बाह्यविकार विषयरूप से यह जगत भले ही सत्य न हो; परन्तु मनोविकाररूप स…
- Verse 5जैसे प्रतिदिन की युषुप्ति है वैसे ही प्रलय भी है। सुषुप्ति अवस्था में लीन मन के जाग्रतकाल…
- Verses 6–8श्रीरामचन्द्रजी के अभिप्राय का प्रकाशन करते हुए श्रीवसिष्ठजी समाधान करते है । श्रीवसिष्ठज…
- Verse 9पूर्वकल्पीय सर्ग स्मृतिरूप ही हैं, वेभी सिद्ध नहीं होंगे, इसलिए अनुभूत या अननुभूत स्वतःसि…
- Verse 10उक्त अर्थ को ही स्पष्ट कहते हैं। जो यह जगतरूप से और स्वयंभूरूप से (उत्पत्ति के पहले पृथक्…
- Verse 11अनादि काल से सिद्ध जो ब्रह्म के स्वरूप का भान है, वही ब्रह्माण्ड शरीर का उपादानकारण जगताक…
- Verse 12जगत का स्वभाव अव्यवस्थित है, इसलिए भी जगत की सत्ता जगद्रूप से नहीं है, किन्तु ब्रह्मरूपसे…
- Verses 13–14उस पूर्व परमाणु के अन्तर्गत अन्य विस्तृत परमाणु है, वह भी पूर्व परमाणु के सदृश ही है तथा…
- Verse 15तत्त्वज्ञो के प्रति सन्मात्रदृष्टि जैसे स्वतः अनन्त है वैसे ही अज्ञो के प्रति असत्, अनृत…
- Verse 16इसी सिद्धान्त को स्पष्ट करके दिखलाते हैं। यह जगत् ज्ञानी के प्रति केवल, शान्त, अविनाशी ब…
- Verse 17ब्रह्माण्ड में वृद्धि को प्राप्त यह भासमान जगत जैसे भासित हो रहा है वैसे ही करोड़ों हजारो…
- Verse 18जैसे स्तम्भ के (खम्भेके) अन्दर प्रतिमा रहती है, उस प्रतिमा के अंगों में भी प्रतिमा रहती ह…
- Verse 19जैसे पर्वत में परमाणु पर्वत से अभिन्न तथा असंख्य हे वैसे ही ब्रह्मरूपी महामेरुपर्वत मे त्…
- Verse 20यदि सूर्य आदि की किरणों में छोटे-छोटे परमाणुओं की गणना हो सके, तो चिद्रूप आदित्य में जो त…
- Verse 21जैसे सूर्य की दीप्ति में, जल में तथा धूलिपुंज में परमाणु भ्रमण करते हैं वैसे ही चिदाकाश म…
- Verse 22यदि कोई कहे कि निष्प्रपंच कूटस्थ ब्रह्म का सविकार सृष्टि रूप से भान कैसे होता है 2 तो नीर…
- Verse 23सृष्टिरूप में समझी गई यह सृष्टि अधोलोकको प्राप्त कराती हे । श्रुति ने भी कहा है : "उदरमन्…
- Verse 24जैसा कि नैयायिक परमात्मा को तटस्थरूप (निमित्तमात्ररूप) मानते हैं वैसे तटस्थ रूप से ज्ञात…