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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 3

दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्म जगत की विवर्तरूपता का स्थापन करके बोधदृष्टि से उसके बाध का प्रदर्शन तथा अज्ञ पुरुष की दृष्टि में जगत की अनन्तता का वर्णन ।

21 verse-groups

  1. Verse 1यद्यपि बाह्य घट आदि पदार्थो की उत्पत्ति में उत्पक्तिकर्ता से अतिरिक्त सहकारी कारणो की अपे…
  2. Verse 2आप कहते हैं) यह जगत स्मृतिरूप ही है, पहले-पहल सर्वप्रथम प्रजापति स्मरणरूप से ही उत्पन्न ह…
  3. Verse 3इस कारण उसका संकल्पभूत यह जगत स्मृतिरूप ही है, प्रजापति का प्राथमिक संकल्प का नगर ही इस ज…
  4. Verse 4अस्तु, मन से अतिरिक्त बाह्यविकार विषयरूप से यह जगत भले ही सत्य न हो; परन्तु मनोविकाररूप स…
  5. Verse 5जैसे प्रतिदिन की युषुप्ति है वैसे ही प्रलय भी है। सुषुप्ति अवस्था में लीन मन के जाग्रतकाल…
  6. Verses 6–8श्रीरामचन्द्रजी के अभिप्राय का प्रकाशन करते हुए श्रीवसिष्ठजी समाधान करते है । श्रीवसिष्ठज…
  7. Verse 9पूर्वकल्पीय सर्ग स्मृतिरूप ही हैं, वेभी सिद्ध नहीं होंगे, इसलिए अनुभूत या अननुभूत स्वतःसि…
  8. Verse 10उक्त अर्थ को ही स्पष्ट कहते हैं। जो यह जगतरूप से और स्वयंभूरूप से (उत्पत्ति के पहले पृथक्…
  9. Verse 11अनादि काल से सिद्ध जो ब्रह्म के स्वरूप का भान है, वही ब्रह्माण्ड शरीर का उपादानकारण जगताक…
  10. Verse 12जगत का स्वभाव अव्यवस्थित है, इसलिए भी जगत की सत्ता जगद्रूप से नहीं है, किन्तु ब्रह्मरूपसे…
  11. Verses 13–14उस पूर्व परमाणु के अन्तर्गत अन्य विस्तृत परमाणु है, वह भी पूर्व परमाणु के सदृश ही है तथा…
  12. Verse 15तत्त्वज्ञो के प्रति सन्मात्रदृष्टि जैसे स्वतः अनन्त है वैसे ही अज्ञो के प्रति असत्‌, अनृत…
  13. Verse 16इसी सिद्धान्त को स्पष्ट करके दिखलाते हैं। यह जगत्‌ ज्ञानी के प्रति केवल, शान्त, अविनाशी ब…
  14. Verse 17ब्रह्माण्ड में वृद्धि को प्राप्त यह भासमान जगत जैसे भासित हो रहा है वैसे ही करोड़ों हजारो…
  15. Verse 18जैसे स्तम्भ के (खम्भेके) अन्दर प्रतिमा रहती है, उस प्रतिमा के अंगों में भी प्रतिमा रहती ह…
  16. Verse 19जैसे पर्वत में परमाणु पर्वत से अभिन्न तथा असंख्य हे वैसे ही ब्रह्मरूपी महामेरुपर्वत मे त्…
  17. Verse 20यदि सूर्य आदि की किरणों में छोटे-छोटे परमाणुओं की गणना हो सके, तो चिद्रूप आदित्य में जो त…
  18. Verse 21जैसे सूर्य की दीप्ति में, जल में तथा धूलिपुंज में परमाणु भ्रमण करते हैं वैसे ही चिदाकाश म…
  19. Verse 22यदि कोई कहे कि निष्प्रपंच कूटस्थ ब्रह्म का सविकार सृष्टि रूप से भान कैसे होता है 2 तो नीर…
  20. Verse 23सृष्टिरूप में समझी गई यह सृष्टि अधोलोकको प्राप्त कराती हे । श्रुति ने भी कहा है : "उदरमन्…
  21. Verse 24जैसा कि नैयायिक परमात्मा को तटस्थरूप (निमित्तमात्ररूप) मानते हैं वैसे तटस्थ रूप से ज्ञात…