Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
स्मृतिर्न संभवत्येव सर्गादौ परमात्मनः ।
जन्माभावात्कथं कुत्र नभसीव महाद्रुमः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
अस्तु, मन से अतिरिक्त बाह्यविकार विषयरूप से यह जगत भले ही सत्य न हो; परन्तु
मनोविकाररूप से तो सत्य ही है, जैसे चित्राकित घोड़ा मांसविकाररूप से सत्य नहीं है; परन्तु रंग के
विकाररूप से तो सत्य ही है, श्रीरामचन्द्रजी की ऐसी शंका को लक्षणों से पहचान कर श्रीवसिष्टजी
कहते हैं।
सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा की स्मृति नहीं हो सकती है । भाव यह है कि स्मरणकर्ता के रहने पर
स्मृति आदि मन के परिणाम हो सकते हैं। सांख्यवादियों द्वारा परिकल्पित प्रधान स्मृतिकर्ता नहीं हो
सकता, क्योंकि वह मिट्ठी आदि की तरह अचेतन है। पुरुषों में भी स्मृतिकर्तव्य का सम्भव नहीं है, क्योकि
सांख्यवादियों ने उन्हे असंग, उदासीन एवं निर्विकार माना है । यदि पुरुषों में स्मृति का सम्भव नहीं है,
तो परस्पर भेदक धर्म के न मानने के कारण भेद की सिद्धि न होने से परमात्मा के साथ उनका भेद होने
से उनमें सुतरां स्मृति का सम्भव नहीं है। और अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः“ इत्यादि श्रुतियों ने परमात्मा के
मन का निषेध किया हे । मन के निषेध द्वारा स्मृतिकर्तव्य का भी निषेध सिद्ध हुआ। चूँकि स्मृति का जन्म
ही असम्भव है और जन्म के अभाव से जन्ममूलक उसके विकार जगत का भी सम्भव नहीं है, इसलिए
आकाश में महावृक्ष के तुल्य स्मृति के विकारभूत जगत कहाँ और कैसे हो सकते हैं ?