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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । महाकल्पान्तसर्गादौ प्रथमोऽसौ प्रजापतिः । स्मृत्यात्मा जायते मन्ये स्मृत्यात्मैव ततो जगत् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि बाह्य घट आदि पदार्थो की उत्पत्ति में उत्पक्तिकर्ता से अतिरिक्त सहकारी कारणो की अपेक्षा हो सकती है, तथापि जगत को आपने हिरण्यगर्भ के मनः संकल्प से जन्य उनकी स्मृति तथा मनोराज्य के तुल्य बतलाया है । स्वप्नराज्य में तो सहकारी कारण की अपेक्षा कहीं नहीं देखी गई है । इस तरह प्रलयकाल में अपनी सत्ता में छिपकर विद्यमान ही मनोरूप प्रजापति स्मृतिरूप ही उत्पन्न होता है, तो सहकारी कारणों के अभाव में जगत की उत्पत्ति मे क्या विरोध है ? इस गुढ अभिप्राय से श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं : भगवन्‌, महाप्रलय के अनन्तर सृष्टि के आरम्भ में सर्वप्रथम यह प्रजापति स्मृतिरूप उत्पन्न होता है। इसकी उत्पत्ति में सहकारी कारणों की अपेक्षा नहीं है, यह भाव है

सर्ग सन्दर्भ

दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्म जगत की विवर्तरूपता का स्थापन करके बोधदृष्टि से उसके बाध का प्रदर्शन तथा अज्ञ पुरुष की दृष्टि में जगत की अनन्तता का वर्णन ।