Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
सर्गस्तु सर्गशब्दार्थतया बुद्धो नयत्यधः ।
स ब्रह्मशब्दार्थतया बुद्धः श्रेयो भवत्यलम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
सृष्टिरूप में
समझी गई यह सृष्टि अधोलोकको प्राप्त कराती हे । श्रुति ने भी कहा है : "उदरमन्तरं कुरुते अथतस्य
भयं भवति" अर्थात् इस ब्रह्म में जो जरा सा भी भेद करते हे यानी" यह अन्य है, मे अन्य हू ऐसा भेद
देखता है, उस भेद के दर्शन से उस अनात्मदर्शी पुरुषको भय होता है । ब्रह्मरूप से समझी गई यह सृष्टि
परम मंगलमय हो जाती है, क्योकि "तरति शोकमात्मवित्" (आत्मदर्शी पुरुष शोक को प्राप्त नहीं
होता है) ऐसी श्रुति हे