Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
विज्ञानात्मा शासिता विश्वबीजं ब्रह्मैवालं स्वं चिदाकाशमात्रम् ।
यस्माज्जातं यत्तदेवेति विद्याद्वेद्यं स्वान्तर्बोधसंबोधमात्रम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसा कि नैयायिक परमात्मा को तटस्थरूप (निमित्तमात्ररूप) मानते हैं वैसे तटस्थ रूप से ज्ञात
ब्रह्म क्या मंगलमय नहीं है ? नहीं, ऐसा कहते है।
जो विज्ञानस्वरूप जीव है ओर जो इस विश्व का परम कारण ईश्वर है, वे दोनों परमार्थ दृष्टि से
परिशोधन करने पर पूर्ण, चेतन, एकरस, चिदाकाश ब्रह्म ही हैँ । जिस ब्रह्म से बाह्य तथा आन्तर दोनों
उपाधियाँ उत्पन्न हैँ ।' (तदनन्यत्वमारम्भण शब्दादिभ्यः) “इत्यादि न्याय से जो जिससे उत्पन्न है, वह
तद्रूप ही है, इस तरह सभी वेद्य प्रपंच को स्वात्मबोध होने पर शुद्ध, सम्बोधस्वरूप चिन्मात्र ही समञ्जना
चाहिये । भाव यह है कि परमार्थदृष्टि से जगन्मात्र को ब्रह्म जानने से ही मोक्षप्राप्ति हो सकती है,
अन्यथा नहीं, क्योकि "उतरमन्तरं कुरुते" ऐसी श्रुति है