Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verses 13–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
परमाणुः प्रविततस्तस्यास्ते तादृगेव च ।
भाति भासुरताकारि तादृग्गिरिकुलं पुनः ॥ १३ ॥
तत्रापि तादृगाकारमेव प्रत्यनुसंततम् ।
दृश्यमाभाति भारूपमेतदङ्ग न वास्तवम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
उस पूर्व परमाणु के अन्तर्गत अन्य विस्तृत
परमाणु है, वह भी पूर्व परमाणु के सदृश ही है तथा उसमें भी वैसा ही जंगल, मेघ, आकाश आदिके
साथ प्रकाशमान पर्वतसमूह आदि जगत भासित होता है । उस परमाणु के भीतर भी वैसा ही विस्तृत
परमाणु है, उसमें भी उसी तरह जंगल, मेघ आकाशआदि से विस्तृत यह दृश्य जगत् भासित होता है।
हे श्रीरामचन्द्रजी, यह केवल भानरूप ही है। सत्य नहीं है