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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

शून्यानुभवमात्रात्म भूताकाशमिदं यथा । सर्गानुभवमात्रात्म चिदाकाशमिदं तथा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि निष्प्रपंच कूटस्थ ब्रह्म का सविकार सृष्टि रूप से भान कैसे होता है 2 तो नीरूप, अशून्य आकाशका जैसे स्वरूपविरुद्ध शून्यरूप से या नीलरूप से भान होता है वैसे ही कूटस्थ ब्रह्म का भी सर्गरूप से भान होता है, ऐसा कहते है । जैसे वास्तव में पूर्णं (अशून्य) ओर नीरूप इस भूताकाश का आवरणाभाव (शून्य) ओर असत्य नीलरूप से अनुभव होता है वैसे ही चिदाकाश का सर्गरूप से अनुभव होता है