Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 99
अद्वानबेवाँ सर्ग समाप्त निन्यानवे सर्ग पूर्व सर्ग में कहे गये चित्ताख्यान का क्रम और ओर व्युत्क्रमसे तात्पर्य वर्णन ।
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- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन् - वह महाटवी कौन है, मैने उसे कब और कैसे देखा, वे पुरुष…
- Verses 2–3वास्तव में ब्रह्म ही मिथ्याभूत स्वर्ग, नरक आदि वैचित्र्य की कल्पना से संसाराटवी है और उसक…
- Verse 4यदि को शंका करे कि कब वह शून्य होती है अथवा ऐसी वह किस उपाय से प्राप्त होती है, तो इस पर…
- Verses 5–6उसमें जो ये विशाल कलेवरवाले पुरूष घूमते है, उन्हें आप बड़े भारी क्लेश में डूबे हुए मन जान…
- Verse 7जैसे सूर्य निरन्तर प्रकाश से कमलों को प्रफुल्लित करता है वैसे ही उन्हीं मनों को विवेकरूप…
- Verse 8हे महामते, उनमें से कई एक मन विवेक के प्रसाद से तत्त्वज्ञानको प्राप्त कर मनोभाव का नाश हो…
- Verse 9उनमें से कई मन अज्ञानवश विवेकरूप मेरा अभिनन्दन नहीं करते हैँ । विवेकरूप मेरा तिरस्कार करन…
- Verses 10–15हे रघुकुलमणे, जो ये मैने अन्धकूप कहे हैं, वे घोर नरक है । जो मन केले के वन में प्रविष्ट ह…
- Verse 16जो वह करौदे का वन है, उसे कुटुम्बस्नेह से युक्त, दुःखरूपी कण्टकों से व्याप्त तथा पुत्रैषण…
- Verse 17जो मन करदे के वन में प्रविष्ट कहे गये हैं, उन मनों को आप मनुष्ययोनि में उत्पन्न हुए ओर वह…
- Verse 18हे रघुकुलदीपक, चन्द्रमा की किरणों की नाई शीतल जो कदलीवन पीछे कहा गया है, उसे चित्त को प्र…
- Verse 19उनमें से कई एक मन शास्त्र द्वारा विहित, ध्येय तत्त्व में मन लगानारूप धारणाप्रधान उपासनात्…
- Verses 20–21जिन अज्ञानी पुरुषोंने बुद्धि अथवा चित्त से विचाररूप मेरी उपेक्षा की यानी विचारोद्योग नहीं…
- Verses 22–23हे रामचन्द्रजी, जो मैंने कहा कि पुरुषने बड़े तार स्वर से बहुत रोदन किया, वह भोगसमूह का त्…
- Verse 24बड़े खेद की बात है, इन अंगोंका परित्याग कर कहाँ जाऊँ, यों रो रहे थोड़े बहुत विवेक को प्रा…
- Verse 25जिसे आधा विवेक प्राप्त हो गया है, निर्मल पद प्राप्त नहीं हुआ, ऐसे चित्त को अपने स्नेह, लो…
- Verse 26मेरे परिज्ञान (तत्त्वज्ञान) से पुरुष ने आनन्दमय हास किया, ऐसा जो मैंने कहा, वह चित्त को,…
- Verse 27जिसे पूर्णरूप से विवेक की प्राप्ति हो गई है तथा जिसने संसारस्थितिका परित्याग कर दिया है,…
- Verse 28हँस रहे पुरुष ने उपहासपूर्वक अपने अंग-प्रत्यंग देखे, ऐसा जो मैंने कहा था, उसका यह अर्थ है…
- Verses 29–31मिथ्या विकल्पों से कल्पित विषयों से मैं चिरकालतक ठगा गया, यों उपहास से चित्त ने अपने अंगो…
- Verse 32छिन्न- भिन्न हुए अंग मेरे सामने अन्तर्हित हो गये, ऐसा जो मैंने कहा उससे चित्त के बिना अर्…
- Verse 33जो मैंने पुरूष के हजारों नेत्रों ओर भुजाओं का वर्णन किया है, उससे चित्त की असंख्य आकृतिर्…
- Verses 34–37जो यह वर्णन किया है कि पुरुष अपने-आप अपने ऊपर प्रहार करता है, वह विविध कुकल्पनारूपी आघातं…
- Verses 38–39जो यह दुःख विस्तार को प्राप्त हुआ है, उसको मन ही स्वयं बढाता है । फिर स्वयं ही बन्धन में…
- Verse 40जैसे बालक अपने ऊपर पडनेवाले अनर्थ (दण्ड) की कोई परवाह न कर नानाविध दुर्लीलाओं से खेलता है…
- Verse 41इस विषय मे लौकिक गाथा का उदाहरण देते है । जैसे आधे चीरे हुए खम्भे में डाली हुई कील को उखा…
- Verses 42–43यदि कोई कहे कि योग आदि से निरुद्ध चित्त भी विक्षेपों द्वारा यदि भागता है, तो परमपद प्राप्…
- Verse 44मन ही प्रमाद और विवेक से बन्ध और मोक्ष को धारण करता हे, यह फलित अर्थ कहते है । मन के प्रम…