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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, Verses 2–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 99 · श्लोक 2, 3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । रघुनाथ महाबाहो श्रृणु वक्ष्यामि तेऽखिलम् । न सा महाटवी राम दूरे नैव च ते नराः ॥ २ ॥ येयं संसारपदवी गम्भीराऽपारकोटरा । तां तां शून्यां विकाराढ्यां विद्धि राम महाटवीम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

वास्तव में ब्रह्म ही मिथ्याभूत स्वर्ग, नरक आदि वैचित्र्य की कल्पना से संसाराटवी है और उसकी कल्पना करनेवाले मन ही वे पुरुष हैं, इसलिए वे लोग कोई दूर के मैंने कहे हैं, सो बात नहीं है, ऐसा कहते हैं। श्री वसिष्ठजी ने कहा : हे रघुनाथजी, हे महाबाहो, आप सुनिये, मैं आपसे सब कहूँगा। हे श्रीरामचन्द्रजी, न तो वह महाटवी कहीं दूर है और न वे मनुष्य ही दूरवर्ती हैं। हे रामचन्द्रजी, अतिगंभीर और अपार (अनन्त) लोकों से पूर्ण जो यह संसारपदवी है, उसे आप परमार्थदृष्टि से उसकी सत्ता न होने के कारण शून्य और भ्रान्तिदृष्टि से तो उसकी सत्ता होने से विविध विकारों से पूर्ण महाटवी जानिये