Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, Verses 34–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, verses 34–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 99 · श्लोक 34-37
संस्कृत श्लोक
यदात्मनि प्रहारौघैः पुमान्प्रहरति स्वयम् ।
तत्तत्कुकल्पनाघातैः प्रहरत्यात्मनो मनः ॥ ३४ ॥
पलायते यत्पुरुषः स्वात्मनः प्रहरन्स्वयम् ।
स्ववासनाप्रहारेभ्यस्तन्मनः प्रपलायते ॥ ३५ ॥
स्वयं प्रहरति स्वान्तं स्वयमेव स्वयेच्छया ।
पलायते स्वयं चैव पश्याज्ञानविजृम्भितम् ॥ ३६ ॥
स्ववासनोपतप्तानि सर्वाण्येव मनांसि हि ।
स्वयमेव पलायन्ते गन्तुं युक्तानि तत्पदम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो यह वर्णन किया है कि पुरुष अपने-आप अपने ऊपर प्रहार करता है, वह विविध
कुकल्पनारूपी आघातं (प्रहारो) से मन अपने ऊपर प्रहार करता है, यह दर्शाया है । अपने
ऊपर प्रहार करता हुआ पुरुष अपने से भागता है यह जो वर्णन किया है, उससे अपने
वासनारूपी प्रहारो से मन भागता है, यह दर्शाया है मन अपने-आप अपनी इच्छा से अपने
ऊपर प्रहार करता हे ओर स्वयं भागता है, अज्ञान की महिमा को तो देखिये । यद्यपि मनो में
ब्रह्मपद का ज्ञान प्राप्त करने की स्वरूपयोग्यता है, तथापि सभी मन अपनी-अपनी वासना
से सन्तप्त हैं यानी विक्षोभित हैँ; अतएव स्वयं ही भागते हैँ