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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 99 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

यावज्जीवमनिन्द्यया च रमते शास्त्रार्थसंजातया तुल्यं वासनया मनो हि मुनिवन्मौनेन रागादिषु । पश्चात्पावनपावनं पदमजं तत्प्राप्य तच्छीतलं तत्संस्थेन न शोच्यते पुनरलं पुंसा महापत्स्वपि ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

मन ही प्रमाद और विवेक से बन्ध और मोक्ष को धारण करता हे, यह फलित अर्थ कहते है । मन के प्रमाद से विविध दुःख पर्वतके शिखर के समान बढते हैं और विवेक से जैसे सूर्य के सामने बर्फ गल जाता है वैसे ही सब दुःख जल जाते हैं ॥४ ३॥ यदि मन शास्त्र के अर्थज्ञानसे उत्पन्न हुई श्लाघनीय वासना से सराबोर होकर राग आदि विषयों में निरोधसे जीवनपर्यन्त &. जंगल में बढ़ई आदि बड़े-बड़े बल्लो को आरे से चीरते हैं चीरने के समय आरा सरलतासे आर- पार आ-जा सके इसलिए चीरे हुए काठ के मध्य में कील दे दी जाती है किसी समय की घटना है कि चीरनेवाले लोग एक बड़ बल्लेको आधा चीरकर उसके बीचमें एक कील देकर भोजन करने के लिए अन्यत्र चले गये थे । एक चंचलबुद्धि वानर उस चीरे हुए बल्ले पर बैठकर उस कील को हाथ से हिलाने लगा | उसके अण्डकोष चीरे हुए बल्ले के बीच में थे | बार-बार कील को हिलाने से कील निकल गई, उससे मध्य मेँ स्थित उसके वृषण दब जाने से वह मर गया । इस मरणरूपी दुःख का उसने जैसे स्वयं आवाहन किया, वैसे ही मन भी नाना प्रकार के दुःखों का स्वयं आवाहन करता हे । मुनि की नाई रमता हे, तो बाद में तत्त्वज्ञान से परम पवित्र, जन्म आदि विकारों से शून्य अतएव तीनों प्रकारके तापों के स्पर्श से रहित परिपूर्ण ब्रह्मपद को प्राप्त कर उसमें स्थित यानी जीवन्मुक्त पुरुष को प्रलय आदि बड़ी-बड़ी आपत्तियोंमें भी शोक नहीं होता, क्योकि “तरति शोकमात्मवित्‌" (आत्मज्ञानी पुरुष शोक को पार कर जाता है) ऐसी श्रुति हे