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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, Verses 10–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, verses 10–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 99 · श्लोक 10-15

संस्कृत श्लोक

ये तेऽन्धकूपा गहना नरकास्ते रधूद्वह । कदलीकाननं यानि संप्रविष्टानि तानि तु ॥ १० ॥ स्वर्गैकरसिकानि त्वं मनांसि ज्ञातुमर्हसि । प्रविष्टान्यन्धकूपान्तर्निर्गतानि न यानि तु ॥ ११ ॥ महापातकयुक्तानि तानि चित्तानि राघव । कदलीकाननस्थानि निर्गतानि न यानि तु ॥ १२ ॥ पुण्यसंभारयुक्तानि तानि चित्तानि राघव । करञ्जवनयातानि निर्गतानि न यानि तु ॥ १३ ॥ तानि मानुष्यजातानि चित्तानि रघुनन्दन । कानिचित्संप्रबुद्धानि तत्र मुक्तानि बन्धनात् ॥ १४ ॥ कानिचिद्बहुरूपाणि योनेर्योनिं विशन्ति हि । मनांसि तानि तिष्ठन्ति निपतन्त्युत्पतन्ति च ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे रघुकुलमणे, जो ये मैने अन्धकूप कहे हैं, वे घोर नरक है । जो मन केले के वन में प्रविष्ट हुए हैं, उन्हें आप एकमात्र स्वर्ग में प्रीति रखनेवाले मन जानिये, यानी जो मैने कदली के वन कहे हैं, वे स्वर्ग हैँ । हे रामचन्द्रजी, जो अन्धे कुओं के अन्दर प्रविष्ट हुए फिर उनसे निकले नहीं, उन्हें आप महापातकी चित्त जानिये । हे रघुवर, केले के वनों में स्थित जो मन वहाँ से चिरकाल बीतनेपर भी नहीं निकले, वे प्रचुरपुण्यराशि से सम्पन्न चित्त हैं | हे रघुनन्दन, जो करौदे के वनमें जाकर उससे बाहर नहीं निकले, वे मनुष्यभावमें परिणत चित्त है । मनुष्यजन्म में कोई तत्त्वज्ञान प्राप्त कर (५६) बन्धन से मुक्ति आशय यह है कि स्वतः अपने लिए अनिष्ट स्वशरीरप्रहार आदि में प्रवृत्ति नहीं हो सकती, इसलिए कहना होगा कि वह प्रवृत्ति किसी दूसरे से हुई “किस उनके कतसि (जबरदस्ती वैसे अनिष्टमें नियुक्त करनेवाले किस हेतुभूत से) वे स्वतः अपने ऊपर प्रहार आदियमें उद्यत हुए- यह अर्थ है । “कश्चाऽसौ तत्कर्ता कितत्कर्ता तेन कृतोद्यमाः* ऐसा समास करना चाहिए | ५ मनुष्य देह में वैराग्य आदिका विशेषरूप से संभव है, इसलिए मनुष्यदेह में ज्ञान का अधिकार मुख्य है, यह सूचित करने के लिए "संप्रबुद्धनि" (तत्त्वज्ञान को प्राप्त हुए) कहा है । पा गये हैं । उनमें से कई एक मन से बहुत रूप धारण कर एक योनिसे दूसरी योनि में प्रवेश करते हैं, वे मन भूमि में मनुष्य आदि रूपसे स्थित होते हैं, नरकों में गिरते हैं और स्वर्ग में जाते हैं