Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, Verses 29–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, verses 29–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 99 · श्लोक 29-31
संस्कृत श्लोक
मिथ्याविकल्परचितैर्विप्रलब्धमहो चिरम् ।
इत्यङ्गान्युपहासेन दृष्टानि स्वानि चेतसा ॥ २९ ॥
मनः प्राप्तविवेकं हि विश्रान्तं वितते पदे ।
प्राक्तनादीनताधारं हसन्पश्यति दूरतः ॥ ३० ॥
यदसौ समवष्टभ्य मया पृष्टः प्रयत्नतः ।
तद्विवेको बलाच्चित्तमादत्त इति दर्शितम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
मिथ्या विकल्पों से कल्पित विषयों से मैं चिरकालतक ठगा
गया, यों उपहास से चित्त ने अपने अंगों की ओर देखा । मन जब विवेक प्राप्त कर विस्तृत
पदमें (परम पद में) विश्रान्त होता है तब प्राक्तन अपनी दीनता के आधार विषयों को हँसता
हुआ दूरसे देखता है । मैंने उस पुरुष को योगबल से पकड़कर बड़े जतन से पूछा, इसका
मतलब विवेक जबरदस्ती चित्त को व्याप्त करता है, यह दशनि में हे