Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 99 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
चिरपालनया चैव चिरभावनया तथा ।
अभ्यासात्तुच्छतामेत्य न भूयः परिशोचति ॥ ४२ ॥
मनःप्रमादाद्वर्धन्ते दुःखानि गिरिकूटवत् ।
तद्वशादेव नश्यन्ति सूर्यस्याग्रे हिमं यथा ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि योग आदि से निरुद्ध चित्त भी विक्षेपों द्वारा यदि भागता है, तो परमपद
प्राप्तिरूप इष्टसिद्धि कैसे होगी 2 इस पर कहते है ।
एक बार के निरोध से इष्टसिद्धि नहीं होती है, किन्तु चिरकालतक निरोधकी रक्षा करने से
ओर चिरकालतक असंग अद्वितीय आत्मा की भावनासे अभ्यासवश तुच्छता को प्राप्त (ज्ञान
से बाध्य) होकर फिर मन शोक नहीं करता है