Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 98
सत्तानबेवाँ सर्ग समाप्त अद्जानबेवाँ सर्ग पूर्वोक्त विषयका स्पष्टरूप से ज्ञान होने के लिए चित्ताख्यानका वर्णन तथा चित्त के तत्त्व के विचार से चित्त के विनाश का कथन ।
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- Verse 1यद्यपि आत्मा नित्ययुक्त है, तथापि उसको अपने स्वरूप के अज्ञानसे मैं मन हूँ” इस भ्रान्ति से…
- Verse 2मन को आत्मा में समाहित करने का फल कहते हैं। हे रघुकुलतिलक, परमात्मामें समाहित चित्त वासना…
- Verse 3यदि कोई शंका करे कि केवलमात्र चित्त के निरोध से बाह्य और आभ्यन्तर सकल द्वैतरूप वन्ध की नि…
- Verse 4हे श्रीरामचन्द्रजी, इस विषयमें मेरे द्वारा कहे जा रहे अति उत्तम चित्ताख्यान को, जिसे पहले…
- Verse 5हे श्रीरामचन्द्रजी, मृग, पक्षी आदिसे रहित, बड़े-बड़े विक्षेपों से परिपूर्ण, अतिभयंकर बड़ी…
- Verses 6–10उस महाटवी में महाकाय अतिभयंकर तथा हजारों बाहुओं और हजारों नेत्रों से युक्त एक पुरुष रहता…
- Verses 11–18पूर्ववत् मुद्गरो के प्रहारो से अपने को पीटता हुआ भागने लगा । तदुपरान्त बहुत दूर जाकर जैस…
- Verses 19–20मैंने इस प्रकार के आचरण से युक्त उसको चिरकालतक विवेकदृष्टि से देखकर तथा अपने योगबल से पकड…
- Verse 21हे श्रीरघुनन्दन, मेरे यों पूछने पर उसने कहा : हे मुनिजी, मैं कोई नहीं हूँ और मैं यह कुछ भ…
- Verses 22–23तुमने मुझे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है, इसलिए तुम मेरे शत्रु हो तुमसे देखा गया मैं दुःख के लिए…
- Verse 24एक क्षण में वहाँ पर रोना समाप्त कर वह अपने अंगों को देखकर हँसने और गरजने लगा
- Verses 25–34अट्टहास करने के बाद उस आदमीने मेरे सामने ही अपने उन अंगों का क्रमश: त्याग कर दिया पहले उस…
- Verses 35–42दौड़ते-दौड़ते अन्धकाराच्छन्न बड़े भारी कुएँ मैं गिर पड़ा । उसकी प्रतीक्षा के लिए मैं वहाँ…
- Verses 43–45जब वह शठ बहुत समय बीतने पर भी कुएँसे नहीं निकला तब मैं चलने के लिए उठा । इतने में मुजे फि…