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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, Verses 19–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 98 · श्लोक 19,20

संस्कृत श्लोक

एवंरूपनिजाचारः सोऽवलोक्य चिरं मया । अवष्टभ्य बलादेव मुहूर्तं रोधितः पथि ॥ १९ ॥ पृष्टः स कस्त्वं किमिदं केनार्थेन करोषि वा । किं नामाभिमतं तेऽत्र किं मुधा परिमुह्यसि ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

मैंने इस प्रकार के आचरण से युक्त उसको चिरकालतक विवेकदृष्टि से देखकर तथा अपने योगबल से पकड़ कर हठात्‌ मुहूर्तभर के लिए मार्ग में रोका और उससे पूछा तुम कौन हो, यह अपने ऊपर प्रहार आदि किसलिए कर रहे हो, यहाँ पर तुम्हें किस वस्तु की अभिलाषा है तथा तुम क्यों व्यर्थ मोह में पडे हो ?