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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 98 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

संयोजितं परे चित्तं शुद्धं निर्वासनं भवेत् । ततस्तु कल्पनाशून्यमात्मतां याति राघव ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

मन को आत्मा में समाहित करने का फल कहते हैं। हे रघुकुलतिलक, परमात्मामें समाहित चित्त वासनारहित अतएव शुद्ध हो जाता है । चित्त के वासना शून्य एवं शुद्ध होनेके अनन्तर मन कल्पनाहीन होकर आत्मता को प्राप्त हो जाता है