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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 98 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

त्वयाहमवभग्नोऽस्मि त्वं मे शत्रुरहो वत । त्वया दृष्टोऽस्मि नष्टोऽस्मि दुःखाय च सुखाय च ॥ २२ ॥ इत्युक्त्वा विक्लवान्यङ्गान्यालोक्य स्वान्यतुष्टिमान् । रुरोदातिरवं दीनो मेघो वर्षन्निवाटवीम् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

तुमने मुझे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है, इसलिए तुम मेरे शत्रु हो तुमसे देखा गया मैं दुःख के लिए और सुख के लिए नष्ट हुआ हूँ, - ऐसा कहकर अपने विह्नल अंगों की ओर देखकर जैसे मेघ जंगलमें वृष्टि करता हुआ बड़े जोर से शब्द करता है वैसे ही भोगों से तृप्त न हुआ वह दीन-हीन पुरुष भी बड़े जोरसे रोने लगा