Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, Verses 25–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, verses 25–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 98 · श्लोक 25-34
संस्कृत श्लोक
अथाट्टहासपर्यन्ते स पुमान्पुरतो मम ।
क्रमेण तानि तत्याज स्वान्यङ्गानि समंततः ॥ २५ ॥
प्रथमं पतितं तस्य शिरः परमदारुणम् ।
ततस्ते बाहवः पश्चाद्वक्षस्तदनु चोदरम् ॥ २६ ॥
अथ क्षणेन स पुमांस्तान्यङ्गानि यथाक्रमम् ।
संत्यज्य नियतेः शक्त्या क्वापि गन्तुमुपस्थितः ॥ २७ ॥
दृष्टवानहमेकान्ते पुनरन्यं तथा नरम् ।
सोऽपि प्रहारान्परितः प्रयच्छन्स्वयमात्मनि ॥ २८ ॥
बाहुभिः पीवराकारैः स्वयमेव पलायते ।
कूपे पतति कूपात्तु समुत्थायाभिधावति ॥ २९ ॥
पुनः पतति कुण्डेऽन्तः पुनरार्तः पलायते ।
पुनः प्रविशति श्वभ्रं क्षणं शिशिरकाननम् ॥ ३० ॥
कष्टं पुनःपुनस्तुष्टः पुनः प्रहरति स्वयम् ।
एवंप्रायनिजाचारश्चिरमालोक्य सस्मयम् ॥ ३१ ॥
स मया समवष्टभ्य परिपृष्टस्तथैव हि ।
तेनैवासौ क्रमेणाद्य रुदित्वा संप्रहस्य च ॥ ३२ ॥
अङ्गैर्विशीर्णतामेत्य ययावलमलक्ष्यताम् ।
विचार्य नियतेः शक्तिं ततो गन्तुमुपस्थितः ॥ ३३ ॥
दृष्टवानहमेकान्ते पुनरन्यं तथा नरम् ।
प्रहरंस्तद्वदेवासौ स्वयमेव पलायते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
अट्टहास करने के
बाद उस आदमीने मेरे सामने ही अपने उन अंगों का क्रमश: त्याग कर दिया पहले उसका
संकल्पात्मक सिर गिरा, जो कि सम्पूर्ण अनर्थों का मूल होने के कारण अतिभीषण था। तदनन्तर
विकल्पाशयरूपी भुजाएँ गिरी । तत्पश्चात् विषयाभिनिवेशरूप वक्षःस्थल गिरा । उसके बाद
तृष्णारूपी उदर नष्ट हुआ । इसके पश्चात् वह पुरुष उन अंगों का-एक क्षण में क्रमानुसार
ज्ञान से अज्ञानका बाध होता है, इस नियतिशक्ति से-त्यागकर कहीं जाने को तत्पर हुआ।
किसी गन्तव्य स्थानका निर्देश न होने के कारण वह निःस्वरूप हो गया, यह समझना चाहिए ।
फिर मैंने एकान्त मेँ वैसे ही दूसरे पुरुषको देखा वह भी स्वयं अपने ऊपर अपनी बड़ी स्थूल
बाहुओंसे स्वयं प्रहार करता हुआ भाग रहा था । पहले कुएँ में गिरा | कुएँसे निकलकर फिर
दौड़ने लगा । फिर अन्ध कूपमें गिरा फिर पीडित होकर दौड़ा, फिर करौंदे के वनरूप गड्डेमें
प्रविष्ट हुआ । तदुपरान्त एक क्षण के लिए शीतल केले के वन में प्रविष्ट हुआ | कभी दुःख को
प्राप्त होता और कभी सन्तोष को प्राप्त होता हुआ वह फिर अपने ऊपर स्वयं प्रहार करता,
इस प्रकार का आचरण करनेवाले पुरुष को आश्चर्यपूर्वक चिरकाल तक देखकर मैंने उसे
योगबल से पकड़ा और वैसे ही पूछा । उसीसे वह पुरुष भी क्रमशः रो और हँसकर तथा अंगों
से रहित होकर अदृश्य हो गया । तदनन्तर ज्ञान से अज्ञानका नाश होता है, इस नियति की
शक्तिका विचार कर निःस्वरूपतापत्ति को प्राप्त होने के लिए तत्पर हुआ । फिर मैंने उसी
प्रकार के दूसरे पुरुष को एकान्त में देखा, वह भी उन लोगों के समान स्वयं अपने ऊपर प्रहार
करता हुआ दौड़ रहा था