Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, Verse 1
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उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 98 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यतःकुतश्चिदुत्पन्नं चित्तं यत्किंचिदेव हि ।
नित्यमात्मविमोक्षाय योजयेद्यत्नतोऽनघ ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि आत्मा नित्ययुक्त है, तथापि उसको अपने स्वरूप के अज्ञानसे मैं मन हूँ” इस
भ्रान्ति से बन्धनप्रतीति हुई है, इस प्रकार के निर्णय के लिए ज्ञात आत्मा से मन की उत्पत्ति
विस्तारपूर्वक कही गई। यह कथन रोगनिर्णय के लिए रोग कारणभूत अपथ्य भोजन की उक्ति
के सदुश है। मनस्तत्त्व का निर्णय होने पर अब उसकी चिकित्सा का प्रयत्न करना ही आवश्यक
है, फिर निदानचिन्ता का कोई प्रयोजन नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, मन चाहे जिस किसीसे उत्पन्न हुआ
हो, चाहे उसका स्वरूप जो कुछ भी हो, बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि उसे प्रयत्नपूर्वक
अपनी मुक्ति के लिए आत्मा में समाहित करे
सर्ग सन्दर्भ
सत्तानबेवाँ सर्ग समाप्त अद्जानबेवाँ सर्ग पूर्वोक्त विषयका स्पष्टरूप से ज्ञान होने के लिए चित्ताख्यानका वर्णन तथा चित्त के तत्त्व के विचार से चित्त के विनाश का कथन ।