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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, Verses 43–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, verses 43–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 98 · श्लोक 43-45

संस्कृत श्लोक

न क्वचित्स्थितिमायान्ति केचिद्धर्मपरायणाः । एवंविधा सा वितता रघूद्वह महाटवी ॥ ४३ ॥ अद्यापि विद्यते यस्यामित्थं ते पुरुषाः स्थिताः । सा च दृष्टा त्वया राम त्वयेह व्यवहारिणी । बाल्यात्तु बुद्धितत्त्वस्य न तां स्मरसि राघव ॥ ४४ ॥ सा भीषणा विविधकण्टकसङ्कटाङ्गी घोराटवी घनतमोगहनापि लोके । आगत्य निर्वृतिमलब्धपरावबोधैरासेव्यते कुसुमगुल्मकवाटिकेव ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

जब वह शठ बहुत समय बीतने पर भी कुएँसे नहीं निकला तब मैं चलने के लिए उठा । इतने में मुजे फिर वैसा ही दूसरा पुरुष दिखाई दिया । वह भी उसीके आकार का था और वैसे ही कुएँ आदि में गिर रहा था । उसे झटपट योगबल से पकड़कर मैंने उससे पूछा हे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी, उन्हीं के समान उसने भी मेरे प्रश्न को कुछ नहीं समझा | वह मूढ, “हे पापी, हे दुष्ट ब्राह्मण, तुम कुछ नहीं जानते हो”, ऐसा मुझसे कहकर अपने कार्य में तत्पर होकर चला गया । इसके बाद उस महाअरण्य में विचरण कर रहे मैंने बहुतसे वैसे दोषकारी पुरुषों को देखा | उनमें कुछ तो मेरे द्वारा प्रबोधित होकर स्वप्नभ्रम की नाई पूर्वोक्त स्वरूपनाशरूप उपशम को प्राप्त हुए, कुछ लोगों ने मेरे उपदेश की शव के शरीर के समान उपेक्षा ओर घृणा की और कोई लोग अन्धकूपमें गिरकर फिर उनसे बाहर निकले | कोई शीतल केले के वनसे बहुत समय बीतने पर भी बाहर नहीं निकले यानी वहीं ज्ञान प्राप्त कर मुक्त हो गये कोई विशाल करौदे के वन के गुल्ममें दीर्घकाल तक छिपे रहे॥ ३ ६-४ २॥ काम्य धर्मोमिं तत्पर कोई पुरुष कहींपर भी स्थिरता को प्राप्त नहीं होते हैँ । हे रघुकुलदीप, इस प्रकारकी वह विस्तृत महाटवी आज भी विद्यमान है, जिसमें इस प्रकार वे पुरुष स्थित हैँ । आपसे सब व्यवहारवाली वह महाटवी आपने देखी हे । हे श्रीरामजी, बुद्धिरूपी सार वस्तु के अप्रौढ होने के कारण आपको उसका स्मरण नहीं होता हे । उक्त महाटवी यद्यपि बड़ी भयंकर विविध प्रकार के काँटों से परिपूर्ण, निबिड अन्धकार से व्याप्त ओर घोर है तथापि अधिकारी द्विजाति आदि जन्ममें साधनसम्पत्तिरूप सुख पाकर भी अभाग्यवश जिन्हे परमात्मवबोध नहीं हुआ ऐसे लोग विषयासक्ति से उसका फूलों से परिपूर्ण उद्यानवाटिका के समान सेवन करते हैं