Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 98 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
चित्तायत्तमिदं सर्वं जगत्स्थिरचरात्मकम् ।
चित्ताधीनवतो राम बन्धमोक्षावपि स्फुटम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि केवलमात्र चित्त के निरोध से बाह्य और आभ्यन्तर सकल द्वैतरूप
वन्ध की निवृत्ति कैसे होगी ? इस पर कहते हैं।
हे रामजी, यह सारा चराचर जगत् चित्त के अधीन है, इसलिए हे रघुवर, यह स्पष्ट है कि
बन्ध और मोक्ष भी चित्त के अधीन हैं