Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 97
23 verse-groups
- Verse 1होता हे
- Verse 2श्रीरामचन्द्रजी ने जो तात्पर्य समझा वह ठीक समझा यो उसका अनुमोदन करने के लिए श्रीवसिष्टजी…
- Verses 3–4ब्रह्यात्मक इस जगत् में मन मुख्य आकृति को (जगद्रूप स्थितिको) प्राप्त हुआ है यानी मन ही ब…
- Verses 5–6हे श्रीरामचन्द्रजी, मेरा यह दृढ़ निश्चय है कि विविध प्रकार के आचार, आकाशप्रदेश, ग्राम, नग…
- Verse 7इस प्रकार कर्ता और कर्म के स्वरूप के ज्ञात होने पर उनके शोधनद्वारा उनके अधिष्ठान- भूत आत्…
- Verse 8आत्मा सर्वातीत होता हुआ सर्वव्यापक और सर्वाधार है। मन आदि में गति आदि क्रियाएँ परमात्मा क…
- Verse 9मन का शोधन प्रकार कहते हैं। मेरा निश्चय है कि मन ही कर्म है और मनही तत्-तत् शरीरसमूहका…
- Verses 10–11विचार से मन ही विलय को प्राप्त होगा मनके केवल विलयमात्रसे श्रेय होगा । भ्रम उत्पन्न करनेव…
- Verses 12–13इस प्रकार मन से जगत् की उत्पत्ति भले ही हो, किन्तु कूटस्थ चिन्मात्र स्वभाववाले ब्रह्म से…
- Verse 14इस आशंका का भी आगे कहे जानेवाले दृृष्टिभेद के अभिप्राय से सत्कार्यवादका अवलम्बन कर समाधान…
- Verse 15ये तीनों आकाश अपने सब कार्योमें साधारण हैं, सब स्वकार्योमिं अनुगत है, अतएव उनके हेतु हैं…
- Verse 16तीनों आकाश जब एक ही सत्तावाले है, तो चिदाकाशमें क्या विशिष्टता है ? ऐसी स्वयं आशंका कर उस…
- Verse 17चित्ताकाश का लक्षण कहते हैं। जो सब व्यवहारो का हेतु होने से सब प्राणियों का हितकारी है, ज…
- Verse 18भूताकाशका लक्षण कहते है । दस दिक्मण्डलों में जिसका विशाल कलेवर व्याप्त है ओर जो वायु ओर…
- Verse 19चिदाकाश सन्निधानमात्र से उनका (चित्ताकाश ओर भूताकाशका) निमित्त है, ऐसा दिखलातेहै। ४ यद्यप…
- Verse 20जड़ अंश के मन के आकार में परिणत होने के कारण मनके प्रति मुख्य उपादान होने पर भी मन मे चित…
- Verse 21यह मनकी सृष्टि आदि की कल्पना अज्ञानी को उपदेश देने के लिए है, वास्तविक नहीं है, परमार्थद्…
- Verse 22प्रबुद्ध पुरुषों की दृष्टि में तो सब प्रकारकी कल्पनाओंसे रहित, सर्वव्यापक, सर्वात्मक तीनो…
- Verse 23विविध वाक्यसन्दर्भोसे परिपूर्ण द्रैत और अद्वैत के भेदोंसे अज्ञानी पुरुषको ही उपदेश दिया ज…
- Verse 24हे श्रीरामचन्द्रजी, जब तक आपको ज्ञान नहीं हुआ तभीतक इन तीनों आकाशों की कल्पना है ओर तभी त…
- Verse 25जैसे मरूभूमि में निपतित वनाग्निसदृश सूर्य के ताप से मृगतृष्णाकी (मरूभूमि में मिथ्या जलप्र…
- Verse 26कार्यो में मलिनता दिखलाई देती है अतएव चित्त शुद्ध चित् का कार्य नहीं है ऐसा कहते हैं । च…
- Verse 27चित्त एकमात्र अज्ञानियों द्वारा दृश्य होने से अज्ञानकार्य है, इससे निश्चित है कि अज्ञानीक…