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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 97 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

अप्रबुद्धात्मविषयमाकाशत्रयकल्पनम् । कल्प्यते उपदेशार्थं प्रबुद्धविषयं न तु ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

यह मनकी सृष्टि आदि की कल्पना अज्ञानी को उपदेश देने के लिए है, वास्तविक नहीं है, परमार्थद्वष्टि से शुद्ध चित्‌ से न कुछ उत्पन्न हुआ अथवा न नष्ट हुआ, इसलिए किसी प्रकार के आक्षेप का को अवसर नहीं है, इस आशय से कहते हैं। तीन आकाशों की कल्पना जिसे आत्मतत्त्व अज्ञात है, उस पुरुष के लिए है । उसीके उपदेश के लिए उनकी कल्पना की गई है। आत्मतत्त्व के ज्ञाता पुरुष के लिए उनकी कल्पना नहीं की गई है