Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 97 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
दृढभावोपरक्तेन मनसैवोररीकृतम् ।
मरुचण्डातपेनेव भास्वरावरणं पुनः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने जो तात्पर्य समझा वह ठीक समझा यो उसका अनुमोदन करने के लिए
श्रीवसिष्टजी संक्षेप और विस्तार से कहते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जैसे मरुप्रदेशका प्रचण्ड सूर्य के प्रकाश
तेजस्विता की अप्रतीति के हेतु मृगतृष्णाजल को स्वीकार करता है वैसे ही दृढ़ भावना से
उपरक्त हुए मन ने ही देदीप्यमान आत्मा की अप्रतीति के हेतु अज्ञानजाड्य का अंगीकार
किया है