Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 97 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
चिनोति मलिनं रूपं चित्ततां समुपागतम् ।
त्रिजगन्तीन्द्रजालानि रचयत्याकुलात्मकम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
कार्यो में मलिनता दिखलाई देती है अतएव चित्त शुद्ध चित् का कार्य नहीं है ऐसा कहते हैं ।
चैतन्य पहले अविद्यारूप मालिन्य को प्राप्त होता है तदनन्तर चित्तता को प्राप्त होकर
व्याकुल चित्तरूप वह तीनों लोकरूप इन्द्रजाल की रचना करता है