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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 86

पचासीवाँ सर्ग समाप्त छियासीवाँ सर्ग स्त्रीसहित इन्दु की तपस्या से दस एेन्दवोँ की उत्पत्ति ओर उनमें सबसे ज्येष्ठ के उपदेश से उनकी ब्रह्माहंभावना का वर्णन |

15 verse-groups

  1. Verses 1–2सूर्य ने कहा : हे देवाधिदेव ब्रह्माजी, कल्पनामक आपके अतीत दिनमें जम्बूद्वीप के एक कोने मे…
  2. Verse 3वहाँ पर कश्यपगोत्रोत्पन्न अत्यन्त धर्मात्मा ब्रह्नज्ञानियों में श्रेष्ठ अत्यन्त शान्त इन्…
  3. Verses 4–10अपने वर्ग के लोगों में वहाँ नित्य निवास कर रहे उस महात्मा की प्राणों के तुल्य प्रिय कोई भ…
  4. Verses 11–22जैसे दिन के सूर्य तेज से सन्तापित कुमुदों के लिए चन्द्रमाका उदय होता है, लता और वृक्षों स…
  5. Verses 23–26जैसे निर्मल नक्षत्र आकाश में अपने तेज से शोभित होते हैं, वैसे ही वे वहाँ पर अपने तेजसे शो…
  6. Verses 27–29क्या महत्त्व है, क्या एश्वर्य, क्या अत्यन्त शुभ महावैभव है ? क्या इन लोगों का एेश्वर्य भी…
  7. Verses 30–31जब वे भाई परस्पर वैसा कह रहे थे, इतनेमें जैसे मृगयूथ से एक मृग अन्य मृगों से कहता है वैसे…
  8. Verses 32–36सम्पूर्णं एेश्वर्यो मेँ जो कल्पान्त तक यानी प्राकृत प्रलयपर्यन्त नष्ट नहीं होता, हे भाइयो…
  9. Verses 37–42रूचि होने के कारण उसका उपाय पूछते हैं । और उन्होंने कहा : हे तात, जरा, मरण आदि सम्पूर्ण द…
  10. Verse 43खूब खिले हुए कमल के कोश का मुख ही मेरा उन्‍नत आसन हे, मैं ब्रह्मा ह, मे जगतां का रचयिता,…
  11. Verses 44–45कान्तियो के जालरूपी पाशो से दिशाओं को बोधकर रसो के आदान के लिए ये प्रचुर किरणोंवाले बारह…
  12. Verses 46–47ये शुद्धवृत्तिवाले लोकपाल न्याययुक्त होने के कारण महती मर्यादाओं से लोककी ऐसे रक्षा कर रह…
  13. Verses 48–49यह संवत्सर बीता, यह युग भी कूच कर गया, यह सृष्टि का समय है, यह संहारका समय है, यह कल्प बी…
  14. Verse 50इसके अनन्तर वे दस ऐन्दव ब्राह्मण इस प्रकार क भावित बुद्धि से पत्थर में खुदी हुई प्रतिमाओं…
  15. Verse 51हे ब्रह्मन्‌, तदनन्तर कुशासन में स्थित वे दस ऐन्दव, अपने में ब्रह्मा की कल्पना होने पर जि…