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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, Verses 44–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

दीप्रजालवरत्राभिरवष्टभ्याथ दिग्गणम् । क्रमेण प्रतपन्त्येते भानवो भूरिभानवः ॥ ४४ ॥ लोकपाला इमे लोकं रक्षन्ति शुद्धवृत्तयः । मर्यादाभिरतुच्छाभिर्गोपाला गोगणं यथा ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

कान्तियो के जालरूपी पाशो से दिशाओं को बोधकर रसो के आदान के लिए ये प्रचुर किरणोंवाले बारह सूर्य चैत्र आदि मासों के क्रम से मेरे अन्दर तप रहे हैं