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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, Verses 32–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, verses 32–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

एतदुक्तं तदखिला द्विजपुत्रास्त उत्तमाः । वचोभिरैन्दवास्तत्र साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ ३२ ॥ ऊचुश्चेदं कथं तात सर्वदुःखोपमार्जनम् । पद्मासनं जगत्पूज्यं विरञ्चित्वमवाप्नुमः ॥ ३३ ॥ भ्रात्रा तेन पुनः प्रोक्ता भ्रातरो भूरितेजसः । \\xa0मदुक्तं सर्व एवेमे भवन्तः पालयन्तु वै ॥ ३४ ॥ पद्मासनगतो भास्वान्ब्रह्माहमिति तेजसा । सृजामि संहरामीति ध्यानमस्तु चिराय वः ॥ ३५ ॥ अग्रजेनेति कथिते बाढं कृत्वा त उत्तमाः । ध्यानाधीनधियस्तस्थुः सहैव ज्यायसा रसात् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्णं एेश्वर्यो मेँ जो कल्पान्त तक यानी प्राकृत प्रलयपर्यन्त नष्ट नहीं होता, हे भाइयों, वही ब्रह्मात्व (हिरण्यगर्भता) यहाँ मुझे रूचती है और कोई वस्तु मुझे रूचिकर नही है ॥ ३ १॥ भाग्यवश उन सबकी भी उसीमें रूचि हुई, ऐसा कहते हैं । उसके इस वचनका उन सब इन्दुनामक ब्राह्मण के उत्तम पुत्रों ने अनेक साधुवादपूर्वक अपने अपने वचनों से अभिनन्दन किया