Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, Verses 11–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, verses 11–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 11-22
संस्कृत श्लोक
दिनातपातापितयोरिन्दुः कुमुदयोरिव ।
आजगाम तमुद्देशं यत्र तौ विप्रदंपती ॥ ११ ॥
सलतापादपं देशं पुष्पाकर इवेश्वरः ।
दंपती तौ वृषारूढं सोमं सोमार्धशेखरम् ॥ १२ ॥
फुल्लाननौ ददृशतुः कुमुदे शशिनं यथा ।
तौ तं प्रणेमतुर्देव तुषारामलमीश्वरम् ॥ १३ ॥
द्यावापृथिव्यावुदितं परिपूर्णमिवोहुपम् ।
तर्जयन्पवनाधूतनववृक्षाननस्वरम् ॥ १४ ॥
ईश्वर उवाच ।
मृदूहामस्मितस्पन्दि प्रोवाचाथ वचः शिवः ।
वरं विप्र गृहाणाशु तुष्टोऽस्मि तव वाञ्छितम् ॥ १५ ॥
विप्र उवाच ।
मधुमासरसाक्रान्तवृक्षवन्मुदितो भव ।
भगवन्देवदेवेश दश पुत्रा महाधियः ॥ १६ ॥
भानुरुवाच ।
भव्या भवन्तु मे भूयः शोको येन न बाधते ।
अथैवमस्त्विति प्रोच्य जगामान्तर्धिमीश्वरः ॥ १७ ॥
व्योम्नि वारिनिधिर्ह्रादं कृत्वेवोर्मिमहावपुः ।
ततस्तौ दम्पती तुष्टौ शिवलब्धवरौ गृहम् ॥ १८ ॥
गतौ गीर्वाणसदृशौ खमिवोमामहेश्वरौ ।
तत्रासौ ब्राह्मणी गेहे बभूवोदारगर्भिणी ॥ १९ ॥
बभौ पूर्णोदरा श्यामा मेघलेखेव वारिणा ।
कालेऽथ सुषुवे पुत्रान्प्रतिपच्चन्द्रकोमलान् ॥ २० ॥
दशबालांस्ततो मुग्धान्वसुधेव नवाङ्कुरान् ।
कृतब्राह्मणसंस्कारा वृद्धिमीयुर्महौजसः ॥ २१ ॥
स्वल्पेनैव हि कालेन प्रावृषेव नवाम्बुदाः ।
ते सप्तवर्षवयसो बभूवुर्ज्ञातवाङ्मयाः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे दिन के सूर्य तेज से सन्तापित कुमुदों के लिए चन्द्रमाका
उदय होता है, लता और वृक्षों से युक्त वनप्रदेश में वसन्त का आगमन होता है, वैसे ही
जिस प्रदेश में वे ब्राह्मणदम्पती तप कर रहे थे, वहाँ शंकर भगवान् उपस्थित हुए । वे दोनों
दम्पती वृषभपर आरूढ़ उमासहित शशिमौलि भगवान् को देखकर ऐसे विकसितवदन हुए,
जैसे कि चन्द्रमा को देखकर दो कुमुद विकसित होते हैं । उन दोनों ने हिम के तुल्य
विमलदेहवाले देवाधिदेव भगवान् शंकर को ऐसे प्रणाम किया जैसे कि द्यौ और पृथ्वीमें स्थित
मनुष्य उदित हुए परिपूर्ण चन्द्रमा को प्रणाम करते हैं । मलयपवन से कँपाए गये नूतन पल्लवों
से युक्त आम्र आदि वृक्षों के मुख से समान शब्द कर रहे भ्रमर, कोकिल आदि की ध्वनि को
अपनी ध्वनि से तिरस्कृत करते हुए शिवजी मृदु और सौन्दर्य से अत्यन्त उत्कृष्ट स्मित से
अधर को हिलाते हुए निम्नलिखित वचन बोले । शिवजी ने कहा : हे विप्र, तुम मुँहमाँगा वर
माँगो । मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हू, वसन्त ऋतु के रस से आक्रान्त अतएव हरेभरे वृक्ष के
समान तुम खूब प्रसन्न होओ । ब्राह्मण ने कहा : हे भगवन्, हे देवाधिदेव मेरे मंगलमय कर्म
करनेवाले महामति दस पुत्र हों, जिससे फिर मुझे शोक पीडित न करे । श्रीसूर्य ने कहा : जो
तुम चाहते हो वह वैसा ही हो, ऐसा कहकर भगवान् शंकर आकाश में अन्तर्हित हो गये जैसे
कि तरगों से विशाल शरीरवाला समुद्र गरज कर अन्तर्हित हो जाता हे । तदनन्तर शिवजी
से वर पाकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए देवताओं के तुल्य वे दम्पती जैसे शिव और पार्वतीजी
आकाश को गये, वैसे ही अपने घर को गये । वहाँ पर वह ब्राह्मणी उदार गर्भवाली हुई, जैसे
जल से काली मेघघटा परिपूर्णगर्भवाली होकर शोभित होती है, वैसे ही पूर्णगर्भा वह ब्राह्मणी
शोभित हुई । तदनन्तर अवसरपर यानी दसवें महीने में प्रतिपदा के चन्द्रमा की तरह कोमल
भोले-भाले दस बालकों को-जैसे कि पृथ्वी नूतन अंकुरों को उत्पन्न करती हे वैसे ही-
उसने उत्पन्न किया । जैसे वर्षा ऋतु में नूतन मेघ वृद्धि को प्राप्त होते हैं, वैसे ही
ब्राह्मणसंस्कार से सम्पन्न वे बालक थोड़े ही समयमें बड़े तेजस्वी होकर वृद्धि को प्राप्त हुए ।
सात वर्षकी अवस्था में उन्होने सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया