Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, Verses 4–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, verses 4–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 4-10
संस्कृत श्लोक
तस्मिंस्तदा निवसतो नित्यं स्वजनमण्डले ।
तस्य प्राणसमा भार्या काचित्तस्यां महात्मनः ॥ ४ ॥
न बभूवात्मजस्तस्य मरुभूमौ तृणं यथा ।
न व्यराजत सा भार्या तस्य निष्फलपुष्पिता ॥ ५ ॥
ऋज्वी गौरी सुशुद्धापि शून्या शरलता यथा ।
तौ ततो दंपती खिन्नौ पुत्रार्थे तपसे गिरेः ॥ ६ ॥
कैलासस्यांशमारूढौ रूढाविव नवद्रुमौ ।
भूतैरनावृते शून्ये तस्मिन्कैलासकुञ्जके ॥ ७ ॥
तेपतुस्तौ तपो घोरं जलाहारौ तरुस्थिती ।
एकं पानीयचुलकं पीत्वा दिवसपर्यये ॥ ८ ॥
निस्पन्दमुत्थितौ वार्क्षी वृत्तिमाश्रित्य संस्थितौ ।
तस्थतुस्तौ तदा तत्र तावत्कालं तरुव्रतौ ॥ ९ ॥
यावत्त्रेता द्वापरं च युगे द्वे एव ते गते ।
ततस्तुष्टोऽभवद्देवस्तयोः शशिकलाधरः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अपने
वर्ग के लोगों में वहाँ नित्य निवास कर रहे उस महात्मा की प्राणों के तुल्य प्रिय कोई भार्या
थी, जैसे मरूभूमि में तृण उत्पन्न नहीं होता, वैसे ही उसमें उसके कोई पुत्र उत्पन्न नहीं
हुआ जैसे सीधी, सफेद तथा अत्यन्त शुद्ध काशकी लता पुष्प फलशून्य होने के कारण शोभित
नहीं होती, वैसे ही उसकी सर्वगुणसंपन्न भार्या भी पुत्ररहित होने के कारण शोभित नहीं हुई
। पुत्र न होने के कारण अत्यन्त खिन्न हुए वे दोनों दम्पती पुत्रप्राप्ति के लिए तपस्यार्थ केलास
पर्वत के ऊर्ध्वं शिखर में, उत्पन्न हुए नूतन वृक्षों के समान, आरूढ हुए । प्राणियों से रहित
निर्जन उस केलास पर्वत के शिखर पर वृक्ष की स्थिति के समान स्थितिवाले वे दोनों केवल
जल पीकर घोर तपस्या करने लगे । सायंकाल के समय केवल एक चुल्लू जल पीकर निश्चल
वृक्ष की वृत्ति का अवलम्बन कर खड़े रहते थे । वे तब तक वृक्ष के समान खड़े रहे, जब तक
कि त्रेता और द्वापर दोनों ही युग बीत गये । तदुपरान्त देवाधिदेव भगवान चन्द्रशेखर उन
दोनों पर प्रसन्न हुए