Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, Verses 23–26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, verses 23–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 23-26
संस्कृत श्लोक
विरेजुस्तेजसा तत्र नभसीवामला ग्रहाः ।
अथ कालेन महता तेषां तौ पितरौ तदा ॥ २३ ॥
संजग्मतुस्तनुं त्यक्त्वा स्वां गतिं गतिकोविदौ ।
मातापितृभ्यां रहिता दश ते ब्राह्मणास्ततः ॥ २४ ॥
ययुः कैलासशिखरं गृहं संत्यज्य खेदिनः ।
तत्र संचिन्तयामासुरुद्विग्नास्ते वितन्धवाः ॥ २५ ॥
किं स्यादिह परं श्रेय ऊचुश्चेदं परस्परम् ।
किमिह स्यात्समुचितं भ्रातरः किमदुःखदम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
निर्मल नक्षत्र आकाश में अपने तेज से शोभित होते हैं, वैसे ही वे वहाँ पर अपने तेजसे शोभित
हुए । तदुपरान्त बहुत समय बीतनेपर उनके वे माता पिता अपने शरीर का त्यागकर उत्तम
गति को प्राप्त हुए, क्योकि वे प्रधानतम सद्गतिरूप ब्रह्म के ज्ञाता थे । पिता और माता के
देहावसान के बाद माता ओर पिता से रहित दस बालक अत्यन्त खिन्न हुए ओर अपने घर
का परित्याग कर कैलास पर्वत के शिखर पर गये । पिता, माता आदि बान्धवो से रहित अतएव
दुःखी उन लोगों ने वहाँ पर विचार किया - इस जगत् में अत्यन्त सुख क्या है ? यह विचार
कर उन्होंने अपने आपस में यह कहा : हे भाइयों, ऐहिक ओर पारलौकिक सुख के उपायरूप
से कोन वस्तु स्वीकार करने योग्य हे, एेहिक सुखका कारण न होने पर भी परिणाम में दुःख
न देनेवाला क्या है ?