Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
अधिगतकमलासनक्रमास्ते परिगलितेतरतुच्छवृत्तिजालाः ।
सततमतितरां कुशासनस्थाश्चिरमिति पङ्कजकल्पने विरेजुः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्, तदनन्तर कुशासन में स्थित वे दस ऐन्दव, अपने में ब्रह्मा की कल्पना होने पर जिनकी
अन्य तुच्छ वृत्तियाँ विनष्ट हो गई थी और जिन्होंने ब्रह्मा का क्रम (हिरण्यगर्भस्थान) प्राप्त कर
लिया था, निरन्तर अत्यन्त सुशोभित हुए