Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, Verses 46–47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, verses 46–47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 46,47
संस्कृत श्लोक
उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति प्रस्फुरन्ति पतन्ति च ।
तरङ्गा इव तोयानामिमाः प्रतिदिनं प्रजाः ॥ ४६ ॥
सृजामीममहं सर्गं संहरामि तथादृतः ।
अयमात्मनि तिष्ठामि शाम्यामि भुवनेश्वरः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
ये
शुद्धवृत्तिवाले लोकपाल न्याययुक्त होने के कारण महती मर्यादाओं से लोककी ऐसे रक्षा कर
रहे हैं, जैसे गोपाल गायों की रक्षा करते हैं ॥ ४ ५॥ जैसे जलों की तरंगें आविर्भूत होती है, तिरोभूत
होती हैं, विविध विभव आदि से विराजित होती हैं, वैसे ही ये प्रजा प्रतिदिन आविर्भूत होती हैं,
विनष्ट होती हैं, विविध प्रकार के वैभव से सुशोभित होती हैं और दरिद्रता, दोष आदि से इनका
पतनहोता है । यह भुवनेश्वर मैं इस सृष्टि की रचना करता हूँ ओर संहार करता हूँ तथा आदरणीय
होकर पारमार्थिक स्वस्वरूप में स्थित हू, अतएव उपराम को प्राप्त होता हूँ